Sunday, 5 April 2009

Raksha Bandhan


रक्षा बंधन हर साल भारत में मनाया जाता हैं. पूर्णिमा के वक्त पर, हर बहें अपने भाई के हाथ पर एक राखी बांधती हैं. हर भाई का ज़िमादारी हैं के उनके बहें को संभालना हैं और यह राखी इसका प्रतिक हैं. इस त्यौहार का भी एक कहानी हैं. बलि प्रलाध का पोता था और एक महान राक्षश रजा था. वह भगवन विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था. लेकिन इन्द्र (वर्षा का भगवन) और बलि के बीच में जब युद्ध हुआ, विष्णु को इन्द्र को बचाना पड़ा और बलि को पाताल में चोदना पड़ा. बलि को पता था के उनके विष्णुजी उन्हीके बाला के लिए पाताल में डाला पड़ा. विष्णुजी उनके उपासना से खुश हो कर, उनके राजत्व का पहरा बनगया. लक्ष्मी माँ को बहुत दुखी हुई उनके पति को ऐसे देख कर. उन्होने एक ब्राह्मण औरत बन कर, बलि के राजत्व में आकर बलि से पुछा अगर वह उनके राजत्व में रहे सकती हैं. बलि ने उनको अपने बहें जैसे समजकर लक्ष्मीजी को राजत्व में रहेने दिया. लक्ष्मीजी के आने के बाद, राजत्व सफल बनगया. एक दिन, पुर्णिमा के वक्त प्र, लक्ष्मीजी ने बलि के हाथ प्र एक राखी बांध कर, उनके सौभाग्य के लिए पूजा किया. बलि को इतना कुशी हुआ के उसने लक्ष्मीजी को एक वादा दिया. लक्ष्मीजी के कौनसे भी इचा, रजा बलि पूरा करेगा. लक्ष्मीजी ने उसे अपने पताजी (भगवन विष्णु) वापस माँगा. बलि को यह बात समज नहीं आ रहा था. फिर, लक्ष्मीजी और भगवन विष्णु ने अपने असली रूप में बदल्गाये. फिर, रजा बलि को समाज आया के उनके उपासना की वजय से लक्ष्मीजी और भगवन विष्णु अपने आपसे दूर हुए. इसी तरह, रक्षा बंधन शुरू हुआ. हर सल्, बुहेनें अपने भाइयों के हाथ पर राखी बांधते हैं और भाइयों वादा लेते हैं की वे उन्हें रक्षा करेंगे और उन्हें करची देते हैं.

कृष्ण जन्माष्टमी


कृष्ण जन्माष्टमी भारत का एक प्रसिद्द त्यौहार है. जन्माष्टमी अगस्त या सितम्बर के प्रारंभ में पड़ता है. इस साल अगस्त १४ आयेगा. सब लोग जन्माष्टमी की प्रतीक्षा करते है क्योकि उस दिन पर भागवान कृष्ण धरती पर प्रकट हुए. वे अँधेरी और आंधी रात प्रकट हुए,कुकर्मी लोग को मरने के लिए और धाम को बहाल करना. जन्माष्टमी की दिन पर लोग उत्साह से मानते है. भक्त लोग भजन गाते है और संगीत वधे बजाते है. कृष्ण के दर्शन मूर्ति रूप मै करते है. सामान्यत लोग कृष्ण लीला का नाटक मै हिस्सा लेते है. दिन में अभिसेका भी होता है, जहा कृष्ण को दूध से धोते है. लोग खूब खाना बनाते है, १०८ प्रकार के, लेकिन दिन में नहीं खाते है क्योकि खाने उन सब के लिए नहीं है. आधी रात कृष्ण की प्रकट समय है तो सब लोग उनको खाना प्रधान करते है. इस समय लोग नाचकर बजन गेट है. फिर प्रशाद का खाते बता जाता है और लोग घर जाकर सो जाते.

नवरात्रि

बचपन से मैंने बहुत सरे हिन्दुस्तानी त्यौहार मनाया लेकिन मुझे नवरात्रि का त्यौहार अधिक मनपसंद है। यह त्यौहार ज्यादा गुजुरती और बंगाली लोग मनाते हैं। इसका अर्थ नौ रातें, इसी लिए नौ रातें और दस दिन तक मनाया जाते हैं। यह त्यौहार लगभग सेप्टेम्बर या अक्टोबर महीनों में आता है। यह त्यौहार देवी दुर्गा जो गुर्गा माता है उसके नाम पर समर्पित किया है। दुर्गा को भारतीय लोग शक्ति की देवी कहते हैं। ये नौ दिन में पहले तिन दिन देवी दुर्गा , उसके बाद तिन दिन देवी लक्ष्मी , और अन्तिम के तिन दिन देवी सरस्वती को समर्पित करना जाता है। समाज के सब लोग रातों में मिलके डंडिया रास और गरबा का नृत्य करते हैं। और बहुत अच्छा खाना बना के साथ में भोजन करते हें। सबसे लोग रंगीन और सुंदर कपडे पहनता हैं। बहुत सरे पूजा होती है। पुराने दिनों में यह प्रथा थी कि किसानें देवी को पूजा करके ज्यादा उपज होने का आशीवार्द मांगते थे। कोई पुरे सब नौ दिन उपवास करते हैं। दसवाँदिन को वीजय दशमी दिन कहता है और गुजुरत में जलेबी गांन्तियाँ खाकर यह दिन मानते है। जब में दस साल की थी टीबी मेरी मौसी ने मेरे लिए हिन्दुस्तानी से ख़ास रिगीं चोली भेजी थी और मैनें यह नवरात्री में फंकी पुरी रत डंडिया रास किए थे। और बहुत मज़ा आया।

वैसाखी

केशगढ़ आनंदपुर साहिब के पास से 1699 के वैसाखी त्योहार, पर, गुरु गोबिंद सिंह, दसवीं गुरु सिखों के अकाल खालसा की स्थापना की. गुरु गोबिंद, सब के अनुयायियों के लिए भारत पर वैसाखी आनंदपुर में उसे मिला था. गुरु गोबिंद सिंह ने एक तलवार से एक तम्बू से उभरा है और लोगों से अपने विश्वास के लिए अपनी जान देने के लिए कहा है. एक युवा सिख, स्वेच्छा से एक तम्बू में गुरु का पालन किया. कुछ ही समय के बाद, गुरु अकेले अपनी तलवार खून से लथपथ साथ, आये और एक दूसरे स्वयंसेवक के लिए पूछा. एक दूसरे सिख आगे और फिर गुरु के तम्बू में, उसे ले गया और फिर कदम अकेले, अपनी तलवार और खून से लथपथ दिखाई दिया. यह एक तीसरा, चौथा और पांचवा स्वयंसेवक के लिए दोहराया गया था. के रूप में बहुत से कहा कि गुरू के पाँच सिखों को मार डाला था विश्वास भीड़ बहुत, कमज़ोर बने. वह जल्द ही तम्बू के फिर से, इस बार सभी पाँच सिखों कौन है और अच्छी तरह से जीवित थे और पगड़ी और है कि अन्य प्रतीकों में तैयार के बाद बाहर आया बाद से सिख पहचान का प्रतीक हो. उन्होंने कहा कि पंज प्यारी ने पाँच सिखों बुलाया है - प्रेमिका पाँच। एक चाल में अपने कुलनाम छोड़ा - पाँच और सिंह ने आम नाम लिया, साहस की जरूरत के एक अनुस्मारक "शेर" अर्थ. एक ही समय में, गुरु ने सिख औरते कौर कुलनाम दे दिया. गुरुजी तो बैठ गये पाँच से पहले और उसके आरंभ करने के लिए उन से पूछा. अकाल की सेवा करने के लिए एक के जीवन का कुल आत्मसमर्पण का यह अधिनियम, के कालातीत एक, और गुरु गोबिंद सिंह के चरणों में सिख धर्म बनाया. उसके बाद कई शताब्दियों के लिए पंजाब में हिंदू के सभी परिवारों की, पहली नर बच्चे को एक सिख के रूप में नियत करता था.

Saturday, 4 April 2009

वसाखी

वसाखी एक सिक्ख त्यौहार है। लोग एप्रिल १३ या १४ में मनाये जाते है। सिक्ख लोग सरे दुनिया में मनाये जाते है। लोग खालसा के शुरुआत के लिए मनाते है। खालसा १६९९ में शुरू हुआ। सिक्ख लोग फसल के लिए भी मनाये जाते है। इस समय में सिक्ख अपने गुरु के शिक्ष्ण के बारे में सोचते है। लोग बहुत खुशी, रंगीन और दिल से मनाये जाते है।
वसाखी की कहानी यह है: गुरु गोबिंद सिंह जी फसल की त्यौहार पर खेसा से बाहर आया। वह सिक्ख लोगो को पुछा की " अगर आप अपनी जान देने का तयार है, उंदर आइये। पंज सिक्ख आदमी तयार थे। एक एक कर गुरु जी बाहर आयें और उसकी तुल्वार खून पर रिस रहा था। लोग बहुत पुरेशन हुए। पंज आदमी बाहर आयें। गुरु जी ने आदमी को खालसा में बपतिस्मा दिया। लोग नाचते, गाते, और परेड करते है। नगर कीर्तन भी होते है। लोग नगर में गुरु ग्रन्थ साहिब से गाने और भजन गाते है।
लन्दन में वसाखी का त्यौहार त्रफालगर स्क्वेर में मनाया जाता है। एक बडा मेला भी होता है।

Friday, 3 April 2009

संक्रान्ति



आंधरा प्रदेश में, संक्रान्ति एक बड़ा त्यौहारहै। यह त्यौहार अनाज काटने के समय में आता है। इसलिए यह त्यौहार किसानों के लिए, बहुत खांस है। इस मेले के बारे में, एक कहानी है। इस कहानी है कि इस समय पर, आसमान में, सूरज यात्रा शुरू करता है। संक्रान्ति पर सूरज, उसका स्वगीर्य रस्ते पर, मकर राशि में जाता है। "ग्रेगोरियन कलेंडर" में, संक्रान्ति जनवरी महीनें में आता है।

आंधरा में, लोग संक्रान्ति चार दिन के लिए मानते हैं। पहले दिन का नाम "भोगी" है। इस दिन में, लोग शाम को बड़े अलाव बनते हैं, और नाचते हैं, और जानते हैं। दूसरी दिन का नाम संक्रान्ति है। यह दिन सारा संक्रान्ति त्यौहार में, मुख्य दिन हैइस दिन में, सब लोग नए कपड़े पहनते हैं, और भगवान को पूजा करते हैं। भगवान, परिवार, और दोस्तों को मिटाइयां देते हैं। चौथा दिन का नाम "मुकानुमा"' है। यह दिन मांसाहारी लोग बहुत माँसाहारी खाना खाते हैं। पहले तिन दिनों के लिए, यह लोग माँसाहारी खाना नही खाते। संक्रान्ति में, एक बुरा चीज़ है कि बहुत अवैध पणन है।

आन्ध्र में, संक्रान्ति के दौरान भी, "हरिदास" लोग गर-गर जाकर, चावल के लिए पहुंचते हैं। संक्रान्ति के दौरान रंगोली प्रतियोगिते बहुत प्रचलित है। भारतीय लोग संक्रान्ति त्यौहार सारे भारत देश मानते हैं, लेकिन उस के लिए अलग नाम हैं। तमिल नाडू में, "पोंगल" है और पंजाब में, "लोड़ी" है।

Wednesday, 1 April 2009

पोंगल

पोंगल दक्षण भारत में बहुत महेत्वा है। पोंगल के पहले थीं साल महीने लोग बीज ज़मीं में डालते है और जन्वेरी में जब यह बीज उगते है तब बहुत खुशी मनाते है। पोंगल सबसे बड़ा त्योहार है और चार दिन चलता है। यह त्योहार थान्क्स्गिविंग के जैसे होता है। पोंगल चौदह या पंधरा जन्वेरी कर आता है। इस दिन बहुत पूजा होती है और लोग अच्छे कपड़े पहेंते है और बहुत अच्छा खाना बन्ता है। पहला दिन भगवन इन्द्र की पूजा होती है। इन्द्र बारिश का भगवन है और अच्छे पौदों के लिए बारिश जरूरी है। इस दिन बहुत नाच गाना होती है। दुसरे दिन चावल को उबला जाता है और सूर्य भगवन के पूजा होती है। सब लोग नया कपड़े पहेन्ते है। घर के उंदर और बहार रंगोली डालते है। तीसरे दिन सब लोग को पोंगल किलय जाता है और गई को पूजा करके उनको भी खाना दिया जाता है। गई के आरती भी करते है। चौथा दिन मिटा पोंगल बनाया जाता है और भाइयों के लिए पूजा करते है और आरती करते। पोंगल के समय बहुत खुशी होती है।