Saturday, 28 February 2009

दहेज़ प्रथा

जब लड़की की शादी होने वाली है, तो लड़की के माँ बाप को दहेज़ प्रथा देना पड़ता है. दहेज़ प्रथा मै सोने की गहने और रुपयेमेरे मिलते है. मेरे कयल से दहेज़ प्रथा जबरजस्ती नही होनी चाहिए। कुछ परिवार गरीब है और ज्यदा पैसे जमा नही कर सकते है। फिर शादी नही होती या ससुर वाले लड़की को टंक करते है। कब्बी गली भी देते है। अगर ये सब होता तो लड़की को शादी मै कैसे शान्ति मिलेगी? आज कल "रीसस्सन" मै यह कतिना बाद जा रही है। कुछ लोग कहते है की दहेज़ प्रथा एक बीमा होता है- अगर पति का दहांत हो जाए तो पतनी के पास कुछ पैसे होंगे। लेकिन ज्यादातर होता है की पति पैसे बिताता है। फिर अगर दहांत हो जाए तो लड़की के पास पैसे नही होता और लड़की के माँ बाप के पास भी नही। दुरसे कतिने भी है। दहेज़ प्रथा "कास्ट स्य्स्तम" को बचाता है। अजर बहुत पैसे नही हो तो बड़ा दहेज़ प्रथा नही दे सकते है और केवल एक दूसरा गरीब आदमी को शादी करना होगा. दहेज़ प्रथा के जगह मै प्यार देना करना चाहिये। लड़की और लड़का एक दुसरे को समाज करना जरुरी है। दोनों को लिकना चाहिये कि घर की क्या जिम्नेदारी है और कौन करेगा कब। फिर पति पतनी आनंद मै रहेंगे।


दहेज़ प्रथा

दहेज़ प्रथा एक बड़ा दस्तूर है, हिन्दुस्तानी संस्कृती में। दहेज़ प्रथा में, शादी पर, लड़कियों के माता-पिता लड़कों के परिवार को, पैसा और चीजें देते हैं। वे अक्सर पैसा या गहने देते हैं। दहेज़ प्रथा दस्तूर बहुत पूरानी है लेकिन आजकल भी भारत में, दहेज़ प्रथा है। कुछ लोग सिर्फ़ तोफे देते हैं। लेकिन अब भारत में, बहुत प्रथा एक बड़ा समस्या है क्योंकि कुछ लोग शादी के लिए बहुत ज्यादा पैसा को पूछते हैं। और अगर लड़कियों के माता-पिता के पास यह पैसा नही है, तो शादी नही करेगी। अगर लड़कियों के माता-पिता शादी के बाद, पैसा नही देते, तो लड़का, लड़की को, तलक देगी। पुरानी दिनों में, दहेज़ प्रथा था क्योंकि, लड़कियों ने काम नही किया, और वह पैसा उन के लिए था, अगर अपना पति को कुछ होगा। लेकिन, अब बहुत लोग बहुत लालची हैं और इसलिए, भारत में, दहेज़ प्रथा एक बड़ा समस्या है। अगर एक परिवार में, एक लड़की जन्म हो, तो अपने माता-पिता चिंता करते हैं, कि हम अपनी बेटी की शादी को कैसा खर्च दे सकेंगे? मुझे दहेज़ प्रथा दस्तूर नही पसंद है। मेरे ख्याल में, अगर शादी समय पर, दोनों परिवार सिर्फ़ तोफें अदला बदला करें, तो वह बहुत अच्छा लगता है।

Friday, 27 February 2009

दहेज प्रथा

एक हिंदुस्तानी दस्तूर है कि शादी पर दुल्हन का पिताजी दुल्हे का परिवार को कुछ चीजे देता है। पुराने ज़माने में दुल्हन और दुल्हे के माँ-बाप एक दुसरे से मिलकर कुछ चीजे या पैसे दुल्हन के माँ-बाप से मांगते थे। यदि दुल्हन के माँ-बाप वे चीजे नही दे सकते, कभी कभी दुल्हे के माँ-बाप रिश्ते को तोड़ देते थे। लड़के के परिवार कई बार बहुत पैसे लड़की के परिवार से मांगते थे। इसलिए लड़की के परिवार उसकी शादी कभी नही कर सकते। गरीब परिवार लड़की की खुशियाँ नही देख बाल करते थे क्योंकि उन्होंने पैसे चाइये। इसलिए प्यार की शादी कभी कभी होती थी, लेकिन बहुत ही शादी इन्ताजाम हुई। आजकल विलायत के ध्यान भारत में आया और सब शादियाँ बड़ा शेहर में प्यार से होती है। अब छोटा शेहर में प्यार की शादी भी है लेकिन छोटा शेहर में बहुत ही गरीब लोग है कि दहेज चाहते हैं। मै सोचता हुँ कि दहेज तो पागल है और मुझे मालूम है कि अपने माँ-बाप कभी नही दहेज ले लेंगे। जब मेरे माँ-बाप ने शादी किया, अपना दादाजी ने एक ही रुपी दहेज ले लिया। यदि मै शादी करता हूँ, मेरी दुल्हन और मै सिखी का परम्परा सम्मान दे देंगे।

दहेज प्रथा


हिंदुस्तान की संस्कृति में दहेज प्रथा खास तरह से होती है। अक्सर दहेज में दुलहन के माता पिता कुछ पैसे और कुछ चीजे दुल्हे के परिवार को देते हैं। पुराणी दिनों में बाप के लिए दहेज सब से बड़ा भार होता था। जब से लड़की का जन्म होता है तब से उसके बाप उसकी शादी के लिए पैसे बचाना शुरू कर देता है। पूर्व समय में इस लिया माता पिता लड़के होने की आशा रखते थे। उन दिनों में एक बाप सोचता था कि वह अपनी बेटी को जितना ज्यादा दहेज में दे सके उतना अच्हा लड़का उसको मिलेंगा। अगर लड़की अपने से बड़ी जाति में शादी करना चाहती है तो लड़के के माता पिता ज्यादा दहेज मांगते थे। कभी कभी लड़की के साथ दुल्हे के परिवार ने बुरा बर्ताव किया था क्योंकि दहेज उनके लिए कम था। आज कल दहेज में मांगने की प्रथा नही रही लेकिन बाप आशा रखता हैं कि वह खुशी से अपनी बेटी को शादी पर ज्यादा दे सके।

Thursday, 26 February 2009

दहेज प्रथा

दहेज लेना देना भारत में कई साल से परम्परा है। पुराने दिनों में दहेज देना बहुत जरुरी था। हर बाप को अपनी बेटी के लिए दहेज दिए बिना शादी नही हो सकती थी। दहेज का मतलब सिर्फ़ पैसे नही लेकिन गाड़ी, बंगला, और ज़मीं भी था। दहेज देना खुशी की बात थी लेकिन कई परिवारों के लिए बहुत तकलीफ की बात थी। गरीब लोगो के लिए बहुत कष्ट था। लड़कियों का पढा होना सब के लिए खुशी की बात नही थी। बहुत गरीब परिवारों में लड़की पैदा होने पर उसे मार दिया जथा था। जितना ज़्यादा दहेज कोई दे सके उठाना बढ़िया लड़का उन मिल सकता था। दहेज की परम्परा आज भी बहुत प्रति है। आज कल के पड़े लिखे लोग इस परम्परा को मिटाना चाथे है। मैं सोचती हूँ कि दहेज की लेनदेन बहुत बुदी चीज़ है। मैंने बहुत कहानिया सुनी हूँ जहाँ लड़किया को जला दिया होता क्योंकि वहां अपने साथ काफी पैसे नही लायी। मैं सोचती हूँ कि हमारे बच्चो को यह सिखाना चाहिये कि लड़की और लड़का के बिच में कोई अन्तर नही। लड़किया आज कल लड़को के जैसे पदाई कर सकते और अच्छे काम भी पा सकते है। मेरे परिवार में दहेज नही दिया जाता है। अमेरिका में यहाँ रिवाज़ नही है यहाँ लड़का और लड़की ने कोई अन्तर नही है। यहाँ परम्परा हमारे देश में बहुत साल से आया है इसी लिए इसी मिटने के लिए बहुत वक्त लगेगा।